कछुआ और खरगोश
धीमी गति से चलने वाला कछुआ अहंकारी खरगोश को दौड़ में कैसे हरा देता है, यह प्रेरक कहानी।
एक जंगल में एक खरगोश रहता था जो अपनी तेज़ दौड़ने की क्षमता पर बहुत घमंड करता था। वह हमेशा अन्य जानवरों का मज़ाक उड़ाता था, खासकर एक कछुए का, जो बहुत धीमी गति से चलता था।
एक दिन खरगोश ने कछुए को फिर ताना मारा, "तुम तो इतना धीमा चलते हो, तुम मुझसे कभी दौड़ नहीं जीत सकते!" कछुए को यह बात अच्छी नहीं लगी। उसने शांति से कहा, "चलो, फिर दौड़ लगाकर देख लेते हैं।"
खरगोश हँसने लगा, पर उसने चुनौती स्वीकार कर ली। जंगल के सारे जानवरों ने इकट्ठा होकर दौड़ देखने का फैसला किया। लकड़ी पर एक रेखा खींची गई और दूर एक पेड़ को अंतिम स्थान (फिनिश लाइन) तय किया गया।
दौड़ शुरू हुई। खरगोश बहुत तेज़ी से आगे निकल गया, जबकि कछुआ धीरे-धीरे, पर लगातार चलता रहा। कुछ दूर जाकर खरगोश ने पीछे मुड़कर देखा, तो कछुआ बहुत पीछे था। उसने सोचा, "इतना समय है, थोड़ी देर आराम कर लेता हूँ।"
खरगोश एक पेड़ के नीचे छाया में बैठ गया और आराम करते-करते उसे नींद आ गई। इस बीच कछुआ धीरे-धीरे, बिना रुके चलता रहा। वह न तो थका, न ही उसने आराम किया।
जब खरगोश की नींद खुली, तो उसने देखा कि सूरज ढलने को था। वह घबराकर तेज़ी से दौड़ा, पर जब वह फिनिश लाइन पर पहुँचा, तो उसने देखा कि कछुआ पहले ही वहाँ पहुँच चुका था और जानवरों की तालियों से उसका स्वागत हो रहा था।
खरगोश को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने कछुए से माफी मांगी और समझा कि घमंड और लापरवाही कितनी हानिकारक हो सकती है।
शिक्षा: निरंतर मेहनत और धैर्य, घमंड और जल्दबाज़ी पर भारी पड़ता है। "सतत प्रयास ही सफलता की कुंजी है।"