बातूनी कछुआ
एक कछुए की कहानी, जो उड़ते समय ज़्यादा बोलने की आदत के कारण अपनी जान जोखिम में डाल लेता है।
एक तालाब में एक कछुआ अपने दो हंस मित्रों के साथ रहता था। कछुआ बहुत बातूनी था और हमेशा बिना रुके बोलता रहता था, चाहे समय और स्थान सही हो या न हो। उसके हंस मित्र उसे अक्सर सावधान करते थे कि ज़्यादा बोलना कभी मुसीबत में डाल सकता है, पर कछुआ अपनी आदत नहीं बदलता था।
एक साल भयानक सूखा पड़ा, और तालाब का पानी बहुत कम हो गया। हंसों ने कछुए से कहा, "मित्र, यह तालाब अब सूखने वाला है। हम तो उड़कर दूसरे तालाब में जा सकते हैं, पर तुम कैसे जाओगे?"
कछुए ने चिंता जताई, "मुझे भी अपने साथ ले चलो, मैं यहाँ अकेला मर जाऊँगा!" हंसों ने एक तरकीब सोची। उन्होंने एक मोटी लकड़ी ली और कछुए से कहा, "तुम इस लकड़ी के बीच वाले हिस्से को अपने मुँह से कसकर पकड़ लो, हम दोनों इसके दोनों किनारों को अपनी चोंच से पकड़कर उड़ेंगे, और तुम्हें उड़ाकर दूसरे तालाब तक ले जाएँगे।"
हंसों ने कछुए को सख्त चेतावनी दी, "उड़ते समय तुम्हें बिल्कुल भी मुँह नहीं खोलना है, चाहे कुछ भी हो जाए। अगर तुमने बोलने के लिए मुँह खोला, तो तुम गिर जाओगे और मर जाओगे।" कछुए ने वादा किया कि वह बिल्कुल नहीं बोलेगा।
तीनों उड़ान पर निकले। रास्ते में जब वे एक गाँव के ऊपर से गुज़रे, तो नीचे खेलते बच्चों ने यह अद्भुत दृश्य देखा - दो हंस एक कछुए को उड़ा रहे हैं! बच्चे शोर मचाने लगे और हँसते-हँसते चिल्लाने लगे, "देखो, कैसा अजीब और मज़ेदार कछुआ उड़ रहा है!"
कछुआ अपनी आदत के अनुसार यह सुनकर अपनी बात कहने से खुद को रोक नहीं पाया। उसने गुस्से में चिल्लाने के लिए मुँह खोला, "तुम सब मूर्ख हो, मेरा मज़ाक उड़ाते हो..." और जैसे ही उसने मुँह खोला, वह लकड़ी की पकड़ से छूट गया और सीधे नीचे ज़मीन पर जा गिरा।
गिरने से कछुए की मृत्यु हो गई। उसके हंस मित्र उसे बार-बार चेतावनी देने के बावजूद उसकी बातूनी आदत उसकी जान ले गई।
शिक्षा: सही समय पर चुप रहना सीखना बहुत ज़रूरी है। बहुत ज़्यादा बोलने और हर बात का जवाब देने की आदत कभी-कभी बहुत बड़ी मुसीबत में डाल सकती है।