बंदर और लकड़ी का खूँटा
एक जिज्ञासु बंदर की कहानी, जो बिना सोचे-समझे काम करने का नतीजा भुगतता है।
एक बार एक राजा एक मंदिर का निर्माण करवा रहा था। बढ़ई दिन भर लकड़ी काटने और जोड़ने का काम करते थे। दोपहर के समय जब सभी मज़दूर खाना खाने चले जाते, तो काम अधूरा छोड़ कर जाते थे।
एक बढ़ई एक बड़े लकड़ी के लट्ठे को बीच से चीर रहा था। उसने लट्ठे में थोड़ा सा चीरा लगाया था और उसे खुला रखने के लिए उसमें एक लकड़ी का खूँटा (वेज) फँसा दिया था। फिर वह खाना खाने के लिए चला गया।
उस मंदिर के पास के पेड़ों पर बंदरों का एक झुंड रहता था। बंदर बहुत चंचल और जिज्ञासु होते हैं। एक बंदर निर्माण स्थल पर आया और उसने उस आधे चिरे हुए लट्ठे और उसमें फँसे खूँटे को देखा। उसके मन में जिज्ञासा हुई कि यह क्या है।
बंदर ने उस खूँटे को पकड़कर हिलाना शुरू किया। उसके आसपास के अन्य बंदरों ने उसे मना भी किया, "यह मत करो, यह खतरनाक हो सकता है।" पर वह बंदर नहीं माना और उसने अपनी पूरी ताकत से खूँटे को खींच लिया।
जैसे ही खूँटा बाहर निकला, चिरे हुए लट्ठे के दोनों हिस्से वापस आपस में जुड़ गए, और बंदर की पूँछ और पिछला हिस्सा उस चिरे हुए हिस्से के बीच में फँस गया। लट्ठे ने बंदर को बहुत ज़ोर से जकड़ लिया।
बंदर दर्द से ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगा, पर वह खुद को मुक्त नहीं कर पाया। तभी बढ़ई खाना खाकर वापस आ गए। उन्होंने देखा कि बंदर लट्ठे में बुरी तरह फँसा हुआ है। उन्हें बंदर पर तरस तो आया, पर साथ ही गुस्सा भी आया कि उसने उनके काम में दखल क्यों दिया।
बढ़ई ने मुश्किल से बंदर को बाहर निकाला, पर बंदर बहुत बुरी तरह घायल हो गया था। उसे अपनी जिज्ञासा और बिना सोचे-समझे काम करने की आदत का बहुत बड़ा नुकसान भुगतना पड़ा।
शिक्षा: जिस काम से अपना कोई संबंध न हो, उसमें बिना सोचे-समझे दखल नहीं देना चाहिए। ऐसा करने से अक्सर नुकसान ही होता है।