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ब्राह्मण और घी का घड़ा

एक ब्राह्मण की कहानी जो भविष्य की काल्पनिक योजनाओं में खोकर अपना वर्तमान भी खो बैठता है।

Vishvakosh Editorial 21 June 2026 0 views

एक गाँव में देवशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह बहुत गरीब था और भीख माँगकर अपना जीवन चलाता था। एक दिन उसे भीख में बहुत सारा घी और चावल मिल गया। उसने इन्हें एक मटके में भरकर अपने घर की छत पर एक खूँटी से टांग दिया, ताकि चूहे उसे न खा सकें।

रात को वह मटके के नीचे चारपाई पर लेटा हुआ मटके को देखते-देखते सपने बुनने लगा। उसने मन में सोचा, "इस घी को मैं बाज़ार में बेचूँगा। उससे जो पैसे मिलेंगे, उनसे मैं कुछ बकरियाँ खरीदूँगा।"

"फिर बकरियों के बच्चे होंगे, और कुछ समय में मेरे पास बहुत सारी बकरियाँ हो जाएँगी। उन्हें बेचकर मैं गायें खरीदूँगा, फिर भैंसें, फिर घोड़े। मैं बहुत धनवान बन जाऊँगा।"

उसने आगे सोचा, "फिर मैं एक बड़ा सा घर बनवाऊँगा, और एक सुंदर कन्या से विवाह करूँगा। हमारा एक प्यारा सा बेटा होगा, जिसका नाम मैं सोमशर्मा रखूँगा।"

"जब मेरी पत्नी मेरे लिए खाना लेकर आएगी और मैं किसी काम में व्यस्त रहूँगा, अगर वह बार-बार बुलाएगी और मैं ध्यान नहीं देंगा, तो मुझे बहुत गुस्सा आएगा और मैं उसे ज़ोर से डांट दूँगा!"

इतना सोचते ही ब्राह्मण ने गुस्से में अपना हाथ हवा में लहराया, जैसे वह अपनी काल्पनिक पत्नी को मार रहा हो। उसका हाथ ऊपर टंगे मटके से जा टकराया, और मटका टूटकर नीचे गिर गया। सारा घी और चावल ज़मीन पर बिखर गया और उसके शरीर पर भी गिर पड़ा।

इस तरह ब्राह्मण का सारा सपना चकनाचूर हो गया। जो थोड़ा सा धन उसके पास था, वह भी काल्पनिक योजनाओं में खोकर उसने खो दिया।

शिक्षा: भविष्य की हवाई योजनाएँ बनाने में वर्तमान को नज़रअंदाज़ करना नुकसानदायक होता है। जो है, उसकी कद्र करनी चाहिए और सोच-समझकर ही आगे बढ़ना चाहिए।

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