बूढ़ा साँप और चूहों का राजा
एक बूढ़े साँप की कहानी, जो मजबूरी में चूहों के राजा की सवारी बनकर अपने स्वभाव के विपरीत आचरण करना सीखता है।
एक जंगल में मंदविष नाम का एक बूढ़ा साँप रहता था। बुढ़ापे के कारण उसकी आँखों की रोशनी बहुत कम हो गई थी, और वह ठीक से शिकार नहीं कर पाता था, जिससे उसे अक्सर भूखा रहना पड़ता था।
एक दिन भूख से व्याकुल साँप एक जगह बहुत उदास होकर बैठा हुआ था। वहाँ से एक चूहा गुज़रा, जिसका नाम हिरण्यक था और जो आसपास के सभी चूहों का राजा था। उसने साँप से पूछा, "तुम इतने उदास और शांत क्यों बैठे हो? तुम तो हमेशा शिकार के लिए तैयार रहते थे।"
साँप ने एक चाल सोची और बोला, "मुझसे एक बार गलती से एक ब्राह्मण के बेटे को काट लिया गया था, जिससे वह मर गया। उस ब्राह्मण ने मुझे श्राप दिया कि अब से मैं केवल चूहों की सवारी करके ही जीवन यापन करूँगा, शिकार नहीं कर सकूँगा। इसलिए अब मुझे कोई चूहा अपनी पीठ पर बिठाकर घुमाए, तभी मेरा पेट भरेगा।"
हिरण्यक को साँप पर दया आ गई। उसने सोचा कि अगर साँप उसकी सवारी करेगा, तो उससे उसका भी फायदा होगा - साँप की सवारी करने से वह जंगल के दूसरे जानवरों पर रौब झाड़ सकेगा। उसने साँप की पीठ पर बैठकर घूमना शुरू कर दिया।
शुरुआत में साँप ने हिरण्यक को सम्मान से अपनी पीठ पर घुमाया, ताकि उसका भरोसा जीत सके। पर कुछ दिनों बाद, साँप ने धीरे-धीरे एक-एक करके हिरण्यक के अन्य साथी चूहों को पकड़कर खाना शुरू कर दिया, जब वे अकेले मिलते।
हिरण्यक को धीरे-धीरे शक होने लगा कि उसके साथी चूहे कम क्यों हो रहे हैं। एक दिन उसने सच्चाई का पता लगाया और समझ गया कि साँप ने उसे और उसके साथियों को धोखा दिया है। वह बहुत क्रोधित और दुखी हुआ, पर उसने अपनी बुद्धि से समझा कि अब बहुत देर हो चुकी है।
हिरण्यक ने तुरंत साँप की सवारी करना छोड़ दिया और अपने बचे हुए साथियों को दूर एक सुरक्षित स्थान पर ले गया, जहाँ साँप उन तक नहीं पहुँच सकता था। साँप फिर से भूखा और अकेला रह गया।
शिक्षा: मजबूरी या दया दिखाने वाले किसी स्वाभाविक दुश्मन पर बिना सोचे-समझे लंबे समय तक भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। समय रहते सच्चाई पहचानकर खुद को और अपनों को बचाना ज़रूरी है।