कौआ और काला साँप
एक कौवे के जोड़े की कहानी, जो अपने अंडों को खा जाने वाले साँप से अपनी चतुराई से बदला लेते हैं।
एक बड़े पेड़ पर एक कौवा और उसकी पत्नी अपना घोंसला बनाकर रहते थे। हर साल जब कौवी अंडे देती, एक काला ज़हरीला साँप, जो उस पेड़ के नीचे एक बिल में रहता था, ऊपर चढ़कर उन अंडों को खा जाता था।
यह कई सालों से होता आ रहा था, और कौवे का जोड़ा बहुत दुखी था। हर बार जब भी कौवी नए अंडे देती, साँप उन्हें खा जाता, और दोनों कौवे असहाय होकर देखते रहते, क्योंकि साँप से सीधे लड़ना उनके लिए खतरनाक था।
एक बार कौवी फिर से गर्भवती हुई और उसने अंडे दिए। कौवा बहुत चिंतित था कि इस बार भी साँप उन्हें खा जाएगा। उसने अपने एक बुद्धिमान मित्र, एक सियार से सलाह ली, जो जंगल में बहुत चतुर माना जाता था।
सियार ने एक तरकीब सुझाई। उसने कहा, "तुम पास के राज महल में जाओ, जहाँ राजकुमारी रोज़ नदी में स्नान करने जाती है और अपने आभूषण किनारे पर रख देती है। तुम उसका एक कीमती हार चुराकर ले आओ और उस साँप के बिल के पास गिरा देना।"
कौवा सियार की सलाह पर महल गया, और जब राजकुमारी स्नान करने गई, उसने मौका देखकर उसका सोने का हार चुरा लिया। फिर वह उड़कर वापस आया और हार को साँप के बिल के मुँह पर गिरा दिया, ठीक वैसे जैसे सियार ने बताया था।
राजा के सैनिक हार की खोज में निकले, और खोजते-खोजते वे उस पेड़ के नीचे पहुँचे, जहाँ हार साँप के बिल के पास चमक रहा था। हार लेने के लिए जब सैनिकों ने बिल को खोदना शुरू किया, तो उन्हें भीतर एक बड़ा काला साँप दिखा। उन्होंने बिना देर किए साँप को मार डाला और हार लेकर वापस चले गए।
इस तरह कौवे के जोड़े ने अपनी चतुराई और एक अच्छे मित्र की सलाह से उस साँप से हमेशा के लिए छुट्टी पा ली, और इसके बाद उनके अंडे और बच्चे सुरक्षित रहने लगे।
शिक्षा: जब सीधी ताकत से किसी समस्या का हल न निकले, तो बुद्धि और चतुराई से रास्ता खोजना चाहिए। सही समय पर अच्छे मित्र की सलाह बहुत काम आती है।