सियार और ढोल
एक भूखे सियार की कहानी, जो युद्ध के मैदान में पड़े ढोल को देखकर पहले डरता है, फिर अपनी समझदारी से उसकी सच्चाई जान लेता है।
दो राजाओं की सेनाओं के बीच एक भयानक युद्ध हुआ था। युद्ध समाप्त होने के बाद मैदान खाली पड़ा था, जिसमें टूटे हुए हथियार, झंडे और सेना का साजो-सामान बिखरा हुआ था। उसी मैदान में एक बड़ा ढोल भी पड़ा हुआ था, जिसे सैनिक युद्ध के दौरान बजाते थे।
उस जंगल में एक भूखा सियार रहता था, जो भोजन की खोज में घूम रहा था। घूमते-घूमते वह उस युद्ध के मैदान में पहुँच गया। वहाँ उसे कुछ हलचल सुनाई दी - तेज़ हवा के कारण ढोल की रस्सी एक झाड़ी की टहनी से टकरा रही थी, और इससे "धम-धम" जैसी आवाज़ आ रही थी।
सियार यह आवाज़ सुनकर बहुत डर गया। उसने सोचा, "यह कोई बहुत बड़ा और खतरनाक जीव है, जो ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ रहा है। मुझे यहाँ से दूर भाग जाना चाहिए।" वह डरकर पीछे हट गया, पर उसकी भूख इतनी तेज़ थी कि वह वहाँ से पूरी तरह जा नहीं पाया।
कुछ देर छिपकर देखने के बाद सियार ने ध्यान दिया कि वह आवाज़ बार-बार एक ही जगह से आ रही थी, और कोई जीव हिलता-डुलता नज़र नहीं आया। उसने सोचा, "अगर यह कोई जीवित प्राणी होता, तो ज़रूर हिलता-डुलता या इधर-उधर जाता। शायद यह कुछ और है।"
अपनी बुद्धि और सावधानी से सियार धीरे-धीरे उस ढोल के पास गया और देखा कि यह तो एक खाली ढोल है, जिसकी रस्सी हवा से टकरा रही थी। उसका डर दूर हो गया और वह हँस पड़ा अपनी ही मूर्खता पर।
सियार ने ढोल को अपने पंजों और दांतों से फाड़ दिया, ताकि देख सके कि भीतर क्या है। उसे ढोल के भीतर कुछ खाने को नहीं मिला, पर उसकी जिज्ञासा शांत हो गई और उसका डर पूरी तरह खत्म हो गया। वह समझ गया कि बिना जाने-परखे किसी भी चीज़ से डर जाना मूर्खता है।
शिक्षा: अनजान आवाज़ों या चीज़ों से बिना समझे डर जाना उचित नहीं है। सूझ-बूझ और सावधानी से सच्चाई का पता लगाना चाहिए, इससे पहले कि डर हमें नियंत्रित करे।