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वफादार नेवला

एक वफादार नेवले की कहानी, जो अपने बच्चे की रक्षा करता है, पर गलतफहमी में उसकी मालकिन उसे मार देती है।

Vishvakosh Editorial 21 June 2026 0 views

एक गाँव में एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी रहते थे। उनके एक छोटा सा बेटा था। उन्होंने एक नेवले के बच्चे को भी पाल लिया था, जो उनके बेटे के साथ ही बड़ा हुआ। नेवला और बच्चा अच्छे दोस्त बन गए और साथ खेलते थे।

एक दिन ब्राह्मण की पत्नी को कुछ काम से बाहर जाना पड़ा। उसने अपने बेटे को पालने में सुलाया और अपने पति से कहा, "मैं अभी आती हूँ, बच्चे का ध्यान रखना।" पर ब्राह्मण भी किसी काम में व्यस्त होकर बाहर चला गया, और घर में केवल नेवला और सोता हुआ बच्चा रह गया।

नेवला बच्चे के पालने के पास बैठकर उसकी रक्षा करने लगा, जैसे वह हमेशा करता था। तभी एक काला और ज़हरीला साँप घर में रेंगता हुआ आया और पालने की तरफ बढ़ने लगा, बच्चे को काटने के इरादे से।

नेवले ने तुरंत खतरे को पहचान लिया और साँप पर झपट पड़ा। दोनों के बीच भयानक लड़ाई हुई। नेवले ने अपनी पूरी ताकत और फुर्ती से साँप को टुकड़े-टुकड़े कर मार डाला, और इस तरह उसने बच्चे की जान बचा ली। लड़ाई में नेवले का मुँह भी साँप के खून से लाल हो गया।

जब ब्राह्मण की पत्नी घर वापस आई, तो उसने देखा कि नेवले का मुँह खून से सना हुआ है। उसने बिना सोचे-समझे यह मान लिया कि नेवले ने उसके बच्चे को मार डाला है। डर और गुस्से में उसने तुरंत पास रखा एक भारी बर्तन उठाया और नेवले पर ज़ोर से फेंक दिया, जिससे नेवला वहीं मर गया।

जब वह रोते हुए अपने बच्चे के पास पहुँची, तो उसने देखा कि बच्चा बिल्कुल ठीक और सुरक्षित सो रहा था, और पालने के पास मरा हुआ साँप पड़ा था। तभी उसे एहसास हुआ कि नेवले ने असल में उसके बच्चे की जान बचाई थी, और उसने बिना सोचे-समझे अपने सबसे वफादार रक्षक को मार डाला।

वह बहुत पछताई, पर अब बहुत देर हो चुकी थी। उसकी जल्दबाज़ी और गलतफहमी ने एक वफादार और निर्दोष जीव की जान ले ली थी।

शिक्षा: बिना पूरी सच्चाई जाने, जल्दबाज़ी में कोई फैसला नहीं लेना चाहिए। गुस्से या डर में लिया गया फैसला अक्सर अपूरणीय नुकसान कर देता है।

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